अब यह याद नहीं करना चह्ता हूं कि,
कहां से चला हूं और कितना सफर बाकी है..
एक अंतहीन वेदनाओं का सफर..
एक सफर जिसमे सिर्फ धूल ही धूल है..
एक सफर जिसमें जिंदगी हमेशा एक फासला लिये हुये है..
एक सफर जिसका न आरंभ और ना ही अंत है.
एक सफर जिसमें न दरख्तों की छांह है और न ही नीड. का सुकून..
बस सिर्फ चरवैति...चरवैति...चलते रहना...
जीवन की सांझ मे यह तकलीफदेह हो सकता है..परंतु
यही नियति है.|
----------------------------------------- जगदीश.